Monday, 15 February 2010

दलित हैं, हमेशा नहीं रहेंगे.

पिछले दिनों एक लेख पढ़ा. लेख महंगाई और दलित चिंतन से सम्बंधित था. लेखक महोदय का मत था कि महंगाई से मात्र अगड़ों को समस्या है दलितों को नहीं. दलित तो पहले भी अच्छा नहीं खा पाते थे. आज गेंहू खा रहे हैं. सोना पहन रहे हैं. जबकि महंगाई के चलते तथाकथित अगड़े अपने हाई प्रोफाइल जीवन शैली से निम्नतर जीवन जीने के लिए मजबूर हो रहे हैं. इस तरह से लेखक महोदय की समझ में अगड़ों और दलितों का भेद दूर हो रहा है.
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जय महंगाई माता की. चलो जो काम बड़े बड़े सुधारक न कर सके वो महंगाई ने कर दिखाया.

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बड़े बड़े लेखकों की कलम से ऐसे ऐसे तीर चलना निश्चय ही रोंगटे खड़े कर देता है. समाज के विभिन्न वर्गों के बीच भेदभाव यदि किसी अच्छाई की वजह से मिटे तो समझ में आता है, पर मान लीजिये किसी कार दुर्घटना में अगड़े मंत्रीजी और उनका दलित ड्राईवर चल बसें , तो क्या ये खुश होने की बात है कि देखो कितना सही ट्रेफिक प्रॉब्लम था, समाज का इतना बड़ा भेद मिट गया. दोनों कुत्ते की मौत मर गए.

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महंगाई की वजह से सब गरीब हो रहे हैं. ये रोने की बात है न कि खुश होने की. दलित, समाज का कोई वर्ग विशेष नहीं है जो हमेशा ठीक ठीक निर्धारित किया जा सके. ये एक अवस्था है समाज के एक दायरे की. ये दायरा हमेशा पिछड़ा और उपेक्षित ही रहता है चाहे किसी की सरकार हो, कोई भी विधान हो. दायरे में कौन रहेगा ये जरूर निश्चित नहीं है. इसमें रहने वाले लोग बदलते रहते हैं. एक बानगी देखिये.

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मनु स्मृति में दलित दलित हैं. इस्लाम के राज्य में गैर इस्लामी दलित हैं. नाजियों के राज में यहूदी दलित हैं. चीन के राज में तिब्बती दलित हैं. कम्युनिस्टों के राज में गैर कम्युनिस्ट दलित हैं. पूँजीपतियों के राज्य में कामगार दलित हैं. अरब में भारतीय उपमहाद्वीप के लोग दलित हैं. अमेरिका और यूरोप में अफ़्रीकी दलित हैं.  वर्मा में उनकी खुद की सेना का राज है धर्मं भी बौद्ध है पर देशवासी दलित हैं. और भ्रष्ट तंत्र में आम जनता दलित है.

नालायक बहू बेटों के घर में वृद्ध माता पिता दलित हैं. रूढ़िवादी परिवार में लड़कियां दलित हैं. 
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दलित उत्थान कैसे होगा? जो भुगत रहा है वो दलित है. जो अत्याचार कर रहा है वो दबंग है. ये जेनेटिक नहीं है. ये मनःस्थिति है. दबंग को ज्ञान नहीं कि जो कर रहा है वो गलत है और अगर मजबूर को दबाने की जगह उसकी मदद करेगा तो ज्यादा आनंद मिलेगा. मजबूर को ज्ञान नहीं कि वो क्या करे जिससे उत्पीडन मिटे. कई बार ज्ञान होता है पर सामर्थ्य नहीं होती कि आवाज उठाये.

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जरूरत इस बात की है कि मनुष्य के सर्वांगीर्ण उत्थान पर ध्यान दिया जाये. एक अतिशिक्षित समाज में उत्पीडन के अवसर कम होते हैं. सारी दुनिया में नस्लवाद है पर उन जगहों पर नहीं है जहाँ शिक्षा का स्तर ऊंचा है. भारतीय संविधान सभी को एक समान अधिकार की गारंटी देता है. मनु स्मृति को पूछने वाला आज कोई नहीं है. फिर इस बात की क्या आवश्यकता है कि संविधान प्रदत्त अवसर का उपयोग करने की जगह भुला दिए गए धर्मं ग्रंथों को कोसा जाये?
मनुष्य को अपनी स्थिति का आकलन स्वयं करना चाहिए. भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले सभी लोगों की जेनेटिक संरचना समान है. भूतकाल में कुछ वर्ग प्रगति कर गए और कुछ नहीं कर पाए इसका खामियाजा सभी को उठाना पड़ा है. देश गुलामी के गर्त में चला गया था. इस बात को सभी स्वीकार कर चुके हैं.

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जो आज भी हजारों साल पुराने भेदभाव की बात करते हैं वो नहीं चाहते कि मनुष्य विकास क्रम में आगे बढे. और हो भी क्यों न, इससे कुछ लोगों की सरकार चलती है. क्या जनता के वोट का उपयोग करने में और बाद में उसे दर्शन के लिए भी तरसा देने में शोषण नजर नहीं आता? वर्ग भेद तो हमेशा था और ऐसे ही चला तो हमेशा रहेगा.

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हर देशवासी से अनुरोध है कि किसी का शोषण न करे, इसमें जो आनंद है वो तामसिक है, यह आपके मन को और क्लेश देगा. इसके बजाये सबकी सहायता करें. लोगों को दया की भीख भी न दें बल्कि उनमे आत्मविश्वास भरें. उनकी क्षमताओं को निखारने में अपना योगदान दें. सबसे अधिक आनंद अपनी संतान को समर्थ बनाने में और उसके आनंद में आनंदित होने में आता है. जो मजबूर हैं उन्हें समर्थ बनायें. उन्हें ऐसे संस्कार दें कि वे भी किसी दुर्बल का शोषण न करें अपितु उसकी सहायता करें.

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जो अपने को दलित समझते हैं, वे इस बात का भान करें कि यदि उनमे और दूसरों में कोई अंतर है तो वो अवसर का है. नस्ल या जाति का नहीं. इस बात का अनुभव करें कि यदि आप समर्थ होंगे तो अपने आप इस दायरे से बाहर निकल जायेंगे. पर स्मरण रखें कि यदि आप समर्थ बन जाते हैं तो आपका सामर्थ्य दूसरे मजबूरों की सहायता करने में काम आये.
हम एक धरा, एक माँ भारती की संतति हैं. हम में  उपासना पद्धति का भेद हो सकता है. हमारे रंग में भेद हो  सकता है. पर हमारा रक्त एक है. हमारे हित एक हैं. जब सब आगे बढ़ेंगे हम भी बढ़ जायेंगे इस भावना से एक दूसरे की सहायता करें और सतत प्राणायाम के अभ्यास से आपने मन के मैल को मिटा ले.

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संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम. देवा भागं यथापूर्वे संजानाना उपासते ।।‘

हम साथ चलें , साथ बोलें, एक दूसरे के मन को समझें. जिस प्रकार से पूर्व काल में श्रेष्ठ जन आचरण किया करते थे.
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जय भारत.

9 comments:

  1. आपका आलेख बहुत अच्छा लगा और एक एक बात सही है। खेद है कि लोग ऐसे कैसे लिख देते हैं। आपका ब्लागजगत मे स्वागत है। शुभकामनायें

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  2. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  3. बहुत दिनों के बाद ऐसी रचना पढने को मिली जो अक्सर मैं लिखना चाहता ही नहीं बहुत सारेचाहते होंगे सहमत होंगे . चाहते हैं बहुत लोग इसे समझें कहें कह सकें सामने आयें और चाहे तो लेकिन ..........सार्थक विरोध करें.बहस हो और निष्कर्षों पर कुछ अमल भी हो.
    मेरे आशीष .
    राज

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  4. welcome ji .......

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  5. ब्लागों की दुनिया में आपका स्वागत है!

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  6. हम एक धरा, एक माँ भारती की संतति हैं. हम में उपासना पद्धति का भेद हो सकता है. हमारे रंग में भेद हो सकता है. पर हमारा रक्त एक है. हमारे हित एक हैं.
    Behad achha kaha!

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  7. कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,
    धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,
    कलम के पुजारी अगर सो गये तो
    ये धन के पुजारी
    वतन बेंच देगें।



    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में प्रोफेशन से मिशन की ओर बढ़ता "जनोक्ति परिवार "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ ,

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