Wednesday, 22 December 2010

चीन ने फिर कर दिखाया.हम कब करेंगे.

इसे कहते हैं अपनी भाषा से स्नेह. हम कब सीखेंगे. यह प्रश्न हिंदी भाषा के समाचार पत्र-पत्रिकाओं से है. कृपया नीचे दी गयी कड़ी को खोलें.
 चीन में विदेशी शब्दों के प्रकाशन पर रोक

Monday, 19 April 2010

अनुशासन

अपने ही कहे से पलट जाना कभी सरल नहीं होता. मैंने हिंदी में अन्य भाषाओँ के शब्दों के प्रयोग को लेकर एक लम्बा चौड़ा लेख लिखा था. कहीं से भी हिंगलिश का समर्थन नहीं किया था परन्तु अन्य भारतीय भाषाओँ के शब्दों को उपयोग में लाने का समर्थन किया था. कतिपय पाठकों ने लेख का मंतव्य न समझ कर लेख की टांग भी खींची थी. उनकी प्रतिक्रिया भी किसी सीमा तक सही ही थी, मैंने ही कुछ शब्दों जैसे कि स्कूल आदि को हिंदी का अंश बनाने का समर्थन किया था. अब समर्थन करके होना भी क्या है ये शब्द अब मात्र आगंतुक नहीं रहे.
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लगातार हिंदी पत्र पत्रिकाओं को पढ़कर समझ आ गया है कि क्यों कुछ पाठकों ने विपरीत प्रतिक्रियाएं दी थी. करे कोई ठीकरा किसी के सर.
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मैंने अपने लेखों में यथासंभव सरल साहित्यिक हिंदी का प्रयोग किया है. ऐसी जिस पर न तो यह आरोप लगे कि समझ नहीं आ रही, न ही ये आरोप लगे कि हिंदी के नाम पर उर्दू-हिंदी-आंग्लभाषा काढ़ा प्रस्तुत किया गया है.
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पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से समाचार पत्रों ने वर्णसंकर हिंदी का प्रयोग आरम्भ कर दिया है उससे लगता है कि सर्वनाश हो कर रहेगा. यह स्थिति मात्र हिंदी पत्रों की नहीं है. अन्य भाषाएँ भी इससे पीड़ित हैं.
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इस समस्या का हल क्या हो? बड़े महत्व का प्रश्न है. समस्या का हल यह है कि हिंदी अनिवार्य हो. राजकीय स्तर पर इसे अनिवार्य बनाने की मैं बात नहीं करूंगा. यह मेरे सामर्थ्य के बाहर है. मैं अपने स्तर पर इसे अनिवार्य बनाने की बात करूंगा. आंग्लभाषा की अनिवार्यता संदेह से परे है. वह तो अंतर्राष्ट्रीय भाषा है. उससे मुख मोड़ना कूप मंडूक बनने का मार्ग है. परन्तु जो सुख अपनी माँ की गोद में है उसे अन्यत्र ढूंढना भी मूर्खता ही होती है. मैंने इसे अपने स्तर पर अनिवार्य कर दिया है. मैं अपने लेखों में मात्र हिंदी का प्रयोग करता हूँ. यदि कोई शब्द हिंदी में स्मरण नहीं आता या मुझे आता ही नहीं तो आसपास देख कर उसे उठा लूँगा. पर जब कभी सही हिंदी शब्द मिलेगा, वापस आ कर अपने लेख में संशोधन करना नहीं भूलूंगा.
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ठीक यही बात वार्तालाप पर भी लागू होती है. मुझे डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी वाली अत्यंत पांडित्य पूर्ण भाषा नहीं आती. जनसामान्य के कर्ण जो ऐसी भाषा को सुनने के अभ्यस्त नहीं हैं, उनके सम्मुख ऐसी भाषा का प्रयोग श्रेयस्कर भी नहीं है. परन्तु बिना आंग्लभाषा के सरल हिंदी बोलना अत्यंत सरल है.
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अक्सर आलोचक बात उठा देते हैं कि इस पूरे श्रम से क्या लाभ, अभी जब कार्य स्थल से सम्बंधित वार्ता करोगे तो खिचड़ी बनानी ही पड़ेगी. नहीं बनानी पड़ेगी, खिचड़ी बनाने से अच्छा है कि आंग्लभाषा में ही बात कर ली जाये. एक बात और, आरम्भ में साथी व्यवधान उपस्थित करते हैं, व्यंग भी करते हैं. पर न भूलिए, उनका तंत्र भी हिंदी का ही अभ्यस्त है, उनके मस्तिष्क भी सुनते सुनते जाग्रत हो ही जाते हैं. फिर सब हिंदी का ही प्रयोग करते हैं. परिमार्जित भाषा का, मिश्रण का नहीं.
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एक निवेदन हिंदी के विद्वानों से........
      रेल को जब तक लौहपथगामिनी कहेंगे, जनसामान्य उसे रेल ही कहेगा. हिंदी तो संस्कृत की बेटी है. संस्कृत के समस्त नियम यहाँ भी लागू होते हैं. संस्कृत में यदि किसी भी घटना, किसी भी परिस्थिति, किसी भी वस्तु के लिए शब्द गढ़ने की क्षमता है तो फिर उस क्षमता का हिंदी के लिए उपयोग क्यों नहीं किया जाये. जो शब्द रचे जाएँ वे कर्णप्रिय एवं यथासंभव लघु भी होने चाहिए. इस प्रकार से हम कतिपय शब्दों के जो कि आधुनिक विज्ञान की देन हैं, उनके लिए आंग्लभाषा पर निर्भरता से मुक्त हो जायेंगे.

Wednesday, 14 April 2010

एक अच्छा लेख...(मेरे द्वारा लिखा हुआ नहीं है).

 यह लेख श्री वेद प्रताप वैदिक जी ने लिखा है. मैंने इसे दैनिक भास्कर में पढ़ा. यदि ध्यान से पढ़ा जाये तो वैदिक जी ने बहुत ही अच्छे एवं स्पष्ट शब्दों में उस विदेश नीति का खाका खींचा है जो एक वास्तविकता होनी चाहिए.
 ओबामा की नट चाल

Thursday, 1 April 2010

सूर्यपुत्र से साक्षात्कार

आज तो महारथी कर्ण के दर्शन हो गए. रात को ठीक ठाक सोया था और बहुत दिन से उनके बारे में कोई चर्चा या अध्ययन भी नहीं किया था. जो भी हो जब रात २ बजे अपनी नन्ही मुन्नी की किलकारी से आँख खुली तो भास हुआ कि ओ हो ये तो सूर्य पुत्र का साक्षात्कार चल रहा था. ऐसे स्वप्न बड़े भाग्य से आते हैं. स्वप्न शास्त्र के अनुसार इनके दिखाई देने के बाद सोना नहीं चाहिए.....अगर इन्हें सच करना है तो. जिस प्रकार से पुनश्च सो जाने पर स्वप्न विस्मृत हो जाता है, उसी प्रकार से उसका फल भी नष्ट हो जाता है. मैंने भी अपना संगणक उठाया और पूरे घटनाक्रम को लिपिबद्ध करने बैठ गया.

साक्षात्कार लेनी वाली देवीजी का मुख मंडल तो मुझे दिखाई नहीं दिया. आपकी जिनमें आस्था हो उन्ही को इस शब्द चित्र में बिठा दीजिये. हमने इनका नाम साक्षी रख दिया है.  महारथी कर्ण तो वही श्रीमान चोपड़ा जी के महाभारत के कर्णअर्थात पंकज धीर महोदय ही थे. यह है मूर्तिपूजा का फल.जिसकी भावना की गयी है, वह उसी रूप में आकर के दर्शन देगा जिस रूप की भावना की गयी है.

साक्षात्कार आरम्भ हुआ, प्रथम प्रश्न: आप लगभग ५ सहस्त्र वर्षों के पश्चात् पुनः मृत्युलोक में दृष्टिगोचर हुए हैं. यह सब आज के वैज्ञानिक युग में किसी भ्रम के समान भासता है. ऐसा कैसे?

सूर्यपुत्र कर्ण: मैं एक बार पहले भी स्वर्ग से वापस आया था. तब देवराज ने मुझे स्वर्ण के अतिरिक्त अन्न दान का अवसर प्रदान किया था.मैंने यहाँ आकर भोजन एवं अन्य वस्तुएं भी दान की जिससे मुझे स्वर्ग में वे सब भी प्राप्त हों.

साक्षी: वह प्रसंग हमें ज्ञात है. किन्तु इस समय इतने सहस्त्र वर्षों के बाद कैसे आना हुआ?
सूर्यपुत्र कर्ण: देवी, देवराज चाहते थे  कि मैं देखूं कि मेरे जीवन काल में घटित हुए प्रसंगों का इतने समय बाद मृत्युलोक के प्राणियों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है.

साक्षी: अपने अनुभव एवं दृष्टान्त से हमें अवगत कराईये.
सूर्यपुत्र कर्ण: बहुत कुछ तो कलि का प्रभाव और बाकि मनुष्यों के आचरण से समाज का सत्यानाश हुआ ही दीखता है. आप अपने प्रश्न पूछिए.

साक्षी: आपके जीवन में आपके प्रति बहुत अन्याय हुआ. आपको क्या कहना है.
सूर्यपुत्र कर्ण: हाँ मुझे वह सब देखना पड़ा जो एक वीर के लिए उचित नहीं था.

साक्षी: आप अपनी माता को दोषी मानते हैं?
सूर्यपुत्र कर्ण: माता ने जो किया वह उनकी जिज्ञासा का परिणाम था. मैं उन्हें अधिक दोष नहीं देता. परन्तु ऋषिवर ने उन्हें मंत्र देते समय उनकी अवस्था का ध्यान नहीं रखा.

साक्षी: परन्तु फिर भी आपकी  माता ने आपको त्याग दिया.
सूर्यपुत्र कर्ण: यहाँ दोष है, उन्होंने मात्र अपने यश का चिंतन किया. कम से कम अपने माता पिता से तो कहा होता. हमारे माता पिता हमारे सर्वोत्तम मित्र हैं. और यहाँ एक बात और दृष्टव्य है, मेरी माता का अनुभव, वय कम थी. इस कारण वे स्वयं की संतान के बारे में उचित निर्णय नहीं ले पायीं.

साक्षी: अपने पिता सूर्य देव से कोई दुराग्रह. उन्होंने आपको अपने पास क्यों नहीं रखा.
सूर्यपुत्र कर्ण: नहीं, उन्होंने माता की प्रार्थना पर वर देकर अपना कर्त्तव्य किया. सारा संसार पिताश्री के आशीष से ऐश्वर्यवान है. उन्होंने सदा मुझे अपनी छत्रछाया में रखा. विधि शक्तिशाली है. मेरा जन्म महाभारत की आवश्यकता थी.

साक्षी: अपने पालक माता पिता देवी राधा एवं अधिरथ के बारे में कुछ कहें.
सूर्यपुत्र कर्ण: वे तो साक्षात् ईश्वर थे, नदी में बहता जाता बच्चा अपना लेना सब के वश का विषय नहीं.

साक्षी: जिस मञ्जूषा  में आप बहे चले जा रहे थे, उसमे स्वर्ण भी रहा होगा. आपके माथे पर सूर्य का चिह्न एवं कवच कुंडल देख कर उन्हें पता तो चल ही गया होगा कि आप असाधारण हैं. फिर ऐसे बालक को पाल लेना कोई बड़ी बात नहीं. क्या कहते हैं?
सूर्यपुत्र कर्ण: यदि मैं साधारण भी होता तो भी वे मुझे पालते. माता पिता को सुन्दर और कुरूप सब बालक एक जैसे प्यारे होते हैं.

साक्षी: आचार्य द्रोण ने आपको शिक्षा देने से मना किया.
सूर्यपुत्र कर्ण: शिक्षा योग्यता और पात्रता देख कर देनी चाहिए. वे निस्संदेह महान आचार्य थे परन्तु उन्होंने मेरे साथ भेदभाव किया. उन्होंने एकलव्य के साथ भी अन्याय किया. मुझे विश्वास है कि यदि वे अपनी आजीविका के लिए राजसत्ता पर निर्भर ना होते तो वे मुझे और एकलव्य दोनों को शिक्षा देते. शिक्षक को अपनी आजीविका के लिए राजसत्ता का मुख देखना पड़े यह समाज के लिए लज्जा की बात है. इसके परिणाम भयंकर होते हैं.

साक्षी: आपने अपने गुरु परशुराम के साथ छल किया. सूतपुत्र होते हुए भी ब्राह्मण बन कर शिक्षा ली.
सूर्यपुत्र कर्ण: योग्य बनने के लिए कुछ भी करना चाहिए. जब शिक्षक भेदभाव करते हैं तो विद्यार्थी से क्या आशा रखनी चाहिए. मैं मानता हूँ कि विद्या प्राप्ति में छल नहीं करना चाहिए परन्तु मेरे सन्मुख विकट परिस्थितियां थीं. फिर भी उन्होंने मुझे शाप दे कर मुझे नरक जाने से बचा लिया. मेरे कर्म के दीर्घफल को काट कर छोटा कर दिया. उन्होंने मुझ पर बड़ी कृपा की. बिना गुरु के जीवन व्यर्थ है.

साक्षी: आपको अपने भाईयों से ही अपमानित होना पड़ा.
सूर्यपुत्र कर्ण: वे उस समय मेरे विषय में नितांत अनभिज्ञ थे.

साक्षी: पितामह भीष्म से भी आपको कभी स्नेह नहीं मिला.
सूर्यपुत्र कर्ण: वे भी अर्जुन के मोह में इतने ग्रसित थे कि उन्होंने कभी मुझे निष्पक्ष भाव से देखा ही नहीं.

साक्षी: श्रीकृष्ण के विषय में आपका क्या मत है.
सूर्यपुत्र कर्ण: ईश्वर के विषय में किसी का क्या मत हो सकता है.

साक्षी: आपको बार बार सूतपुत्र कह कर अपमानित किया गया.
सूर्यपुत्र कर्ण: सूतपुत्र कहने से कोई अपमानित नहीं होता, सारथि होना तो बड़े गर्व की बात है. श्रीकृष्ण भी तो सारथि बने थे. मुझे आपत्ति इस बात की है कि सूतपुत्र कह कर वीर को वीरों के बीच स्थान नहीं दिया गया. यह वर्ण व्यवस्था का घोर उल्लंघन है. यदि मेरे साथ न्याय होता तो महाभारत का युद्ध ना होता. जो धर्म को जानते थे उन्होंने मेरा तिरस्कार नहीं किया. धर्मज्ञ महात्मा विदुर, भगवान् श्रीकृष्ण ने सदा मुझे अंगराज कर्ण या महारथी कर्ण कह कर ही बुलाया.

साक्षी: अपने परम मित्र दुर्योधन के बारे में बताएं.
सूर्यपुत्र कर्ण: दुर्योधन का मुझे पर उपकार था. यह भाग्य की विडम्बना थी कि मुझे केशव के विपरीत पक्ष में खड़ा होना पड़ा. परन्तु यह समाज को सन्देश था कि यदि आप अपनी मिथ्या वर्जनाओं को नहीं तोड़ेंगे तो जिन्हें धर्मं के साथ होना चाहिए वे धर्मं को नष्ट करने वालों के साथ खड़े होंगे. समाज को चाहिए को प्रतिभाओं को सन्मार्ग पर रखने के लिए उचित वातावरण बनाये.

साक्षी: आपके साथ हुए अन्याय को आजकल दिन प्रतिदिन उछाला जा रहा है. जाति की राजनीति में आपका भी सहारा लिया जा रहा है.
सूर्यपुत्र कर्ण: बड़ी विडम्बना है. वे यह क्यों नहीं देखते कि मैंने भी त्रुटी की थी. मान - अपमान दोनों ही कारणों में भावावेश में बहकर निर्णय नहीं करना चाहिए. यदि मुझे हस्तिनापुर में न्याय नहीं मिला था तो मुझे केशव के पास जाना चाहिए था. वहां धर्म और सम्मान दोनों मिलते. यदि उस समय केशव भी अवतरित ना होते तो मुझे कुछ और करना चाहिए था. परन्तु दुष्ट से मित्रता कभी नहीं करनी चाहिए.

साक्षी: परन्तु सूतपुत्र होने के अभिशाप से छुटकारा नहीं मिलता.
सूर्यपुत्र कर्ण: सूतपुत्र होना अभिशाप नहीं है. समाज का सूतपुत्र को अपमानित करना समाज के लिए अभिशाप है. श्रीराम ने महाराज विभीषण को राक्षस होते हुए भी कंठ से क्यों लगाया था. ईश्वर की दृष्टि में सभी एक हैं. वैसे मैं सूर्यपुत्र हूँ और उतना ही क्षत्रिय हूँ जितने कि पांडव.

साक्षी: आपने कहा कि केशव अवतरित ना होते तो आपको कुछ और करना चाहिए था, क्या?
सूर्यपुत्र कर्ण: मुझे नहीं पता, परन्तु ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का उदाहरण सामने रखना चाहिए था. उन्होंने एक ही जन्म में क्षत्रिय से ब्राह्मण बनने का लक्ष्य प्राप्त किया था. कुछ भी असंभव नहीं है.

साक्षी: इस समय की सामाजिक स्थिति के बारे में आपका क्या विचार है.
सूर्यपुत्र कर्ण: घोर वैमनस्य की स्थिति है. व्यक्ति का परिचय कर्म और योग्यता से होता है, वीर वीर है, ज्ञानी ज्ञानी है, जो सबकी सेवा का लक्ष्य लेकर चले, किसी भी परिस्थिति में लोक कल्याण के कार्य पर अटल रहे वह संत है. सबको अपनी अपनी योग्यता से समाज और स्वयं की उन्नति के लिए उद्योग करना चाहिए. किसी के प्रलोभन में नहीं आना चाहिए.

साक्षी: मैंने अपने घर में पंडितों के मुख से सुना था कि पुराणों का कथन सत्य हो रहा है. धर्म की हानि हो रही है, कलियुग में शूद्रों का राज्य है. आपकी क्या टिप्पणी है.
सूर्यपुत्र कर्ण: इस कथन का त्रुटिपूर्ण अर्थ लगाया गया है. सही अर्थ इस प्रकार है. कलियुग में सभी दुखी हैं. ब्राह्मण का सम्मान इसलिए होता है कि वह ज्ञान देता है. यहाँ ब्रह्मविद्या के अधिकारी तो बचे नहीं. लौकिक विद्या तो पैसे देकर भी प्राप्त हो जाती है. इसलिए उनका सम्मान कठिन हो गया है. क्षत्रिय होना सबके वश की बात नहीं. वैश्य होने के लिए लोकव्यवहार आना चाहिए. अब बचे शूद्र सो सेवा करने के लिए बस नियत चाहिए. शूद्रों के राज्य से अर्थ यह है कि जो सेवा करेगा उसी का यश होगा. महात्मा गाँधी, ईसा मसीह, ये सब सेवा ही करके गए हैं. कलियुग में धर्मं की गति अति मंद हो जाती है. सब जीव दुखी हैं. उनकी सेवा करिए आपको उनका नेतृत्व प्राप्त होगा. यदि आपको शूद्रों के राज्य से इतना भय है तो शूद्र ही बन जाईये ना. निःस्वार्थ सेवा करिए और केशव की वंदना करिए. आपको यश और आनंद का राज्य सब प्राप्त होंगे.

बस इतने में ही मेरी आँख खुल गयी. दानवीर कर्ण सुबह सुबह इतना गूढ़ मंत्र देने आये थे. मैंने उनका कहा आप तक पंहुचा दिया. अब आगे आप जानो. हरे कृष्ण.

Thursday, 4 March 2010

वर मांगो......तात

इस बात की कोई निश्चितता नहीं है कि जो मांगोगे वो मिल ही जायेगा. परन्तु फिर भी माँगना महत्त्वपूर्ण है. इसलिए कि बिना रोये माता को भी पता नहीं चलता कि बच्चे को क्या चाहिए. बिना मांगे भगवान् भी न जाने क्या दे दें. मांगिये क्योंकि कुछ मिल सकताहै और यहाँ तो तपस्या करने की आवश्यकता भी नहीं है.
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गूगल एवं विभिन्न अन्य सूचना तकनीकी आधारित वाणिज्यिक संगठन बहुधा इस मंतव्य के साथ इन्टरनेट उपयोगकर्ताओं से इसी प्रकार के प्रश्न करते देखे जा सकते हैं. उपयोगकर्ता अपनी इच्छा से उन्हें अवगत कराते हैं और बदले में ये संगठन जिस विचार को वास्तविकता में बदलने के लिए चुनते हैं उसके विचारकर्ता को पुरस्कृत करते हैं. विचार जब वास्तविकता का रूप धर कर सामने आता है तो सारा विश्व उसका उपयोग करता है. उदाहरण के लिए कोई भी सामाजिक संपर्क साईट देख लीजिये. इन साईटस के स्वामी संगठन विज्ञापनों के माध्यम से धनार्जन करते हैं.
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आज मैं आपके सन्मुख इसी प्रकार का एक प्रश्न लेकर के उपस्थित हुआ हूँ. अपने देश के सांस्कृतिक गौरव, हिंदी के गौरव या संस्कृत के गौरव के समक्ष सारे विश्व को नतमस्तक करने के लिए क्या आपके मस्तिष्क में कोई विचार है. एक ऐसा मंत्र जो इन्टरनेट जगत में क्रांति ला दे. यह तो सर्वमान्य तथ्य है कि जो इन्टरनेट पर राज करेगा वही विश्व पर भी राज करेगा.
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 मैं ब्रह्मा नहीं, न ही मैं गूगल या कोई बड़ा इन्टरनेट आधारित वाणिज्यिक संगठन हूँ. मैं आप ही की तरह इस महान राष्ट्र का एक अंश मात्र हूँ. आपकी ही तरह मैं भी चाहता हूँ कि हमारा गौरव फिर से स्थापित हो. इसके लिए यत्न करना होगा. हममे से बहुत से लोग हिंदी या संस्कृत विकी को समृद्ध बनाने में लगे हैं. वे महान कार्य कर रहे हैं. जो नहीं कर रहे वे भी करें. अगर संकल्प नहीं कर सकते तो इच्छा ही करें. आपकी इच्छा, आपका विचार, आपका मंत्र इस संसार में परिवर्तन ला सकती है. हिंदी, संस्कृत और भारत को पुनश्च शीर्ष पर आरूढ़ करा सकती है.
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इसलिए हे तात! इच्छा करो और सबको उससे अवगत कराओ. जो समर्थ हैं वे उस इच्छा को फलित करने में अपने सामर्थ्य को लगा देंगे. अगर वर पूरा हुआ तो आपकी बल्ले बल्ले, अगर नहीं हुआ तो कुछ नहीं गया.
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Friday, 26 February 2010

पुनर्मिलन

कल तुम्हें देखा,
स्टाकहोम की बस में,
बैठे हुए निर्विकार,
जैसे देखा था पहले भी एक बार.

तुमने भी मुझे देखा,
उसी शांत मन से,
तुम्हारी वहीँ दृष्टि,
मेरे नयनों में एकाकार.

समय रुक गया,
फिर घिरे बादल,
अनुभव हुआ मुझे ह्रदय में,
नीर का अंश.

तुम फिर क्यों आयीं,
सताने मुझे,
या स्मरण कराने,
सोमेन्द्र,
तुम मरे नहीं हो अब तक,
ये ह्रदय स्पंदित है,
चिर युवा,
और जो किया तुमने,
वो प्रेम ही था,
क्षणिक आकर्षण नहीं.

Wednesday, 24 February 2010

हिंदी के सम्मुख एक और चुनौती

मातृभाषा के ऊपर एक और लेख को लेकर प्रस्तुत हूँ. पिछले लेख पर कुछ टिप्पणियां आयीं. उन्हें ध्यान में रखते हुए लेख में कुछ संशोधन किये हैं. हिंदी में रोजगार नहीं मिलता, इसी कारण से इसकी पूंछ कम हो रही है. एक दम सही बात है. मैंने अपना बचपन नंदन, अमर चित्रकथा, चम्पक से आरम्भ किया था. आज के कुछ बच्चे भी  इन्हें पढ़ते हैं पर आंग्लभाषा में. कारण पूर्णतः स्पष्ट है, माता पिता यही सोचते हैं कि हिंदी में पंडित बन कर के क्या मिलेगा. बड़े हो कर सारी डाक्टरी, इंजीनियरी, वकालत तो आंग्लभाषा में करनी है. आज की आंग्लभाषामय परिस्थिति में ऐसी सोच होना स्वाभाविक है. जो स्वाभाविक है वह हमेशा सही हो ऐसा नहीं होता. अनेकानेक शोध यह प्रमाणित कर चुके हैं कि मातृभाषा में जो सीखते हैं वो अधिक हृदयगम्य होता है. शिक्षा का आरम्भ मातृभाषा में ही होना चाहिए. आंग्लभाषा अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, इसे यूँ ही नहीं छोड़ सकते पर अपनी भाषा का स्थान इससे कहीं ऊंचा और हमेशा इससे पहले है.
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डेनमार्क की अपनी प्रथम यात्रा में जब मैं अपने कार्यस्थल पर पंहुचा तो बातों बातों में मैंने अपने डेनिश सहकर्मी को बताया की कल Odder का पता ढूढने में बड़ी मुश्किल हुई. टैक्सी वाला समझ ही नहीं पा रहा था कि हम किस शहर की बात कर रहे हैं. थक हार कर लिख कर ही बताना पड़ा. वो हँस पड़ा और उसने बताया कि इसे ओदर नहीं, ओडर भी नहीं, ऑडर भी नहीं, औडर भी नहीं बल्कि आउदर कहते हैं. साथ ही उसने बताया कि डेनिश में एक सोफ्ट डी होता है एक हार्ड डी. अब बारी हमारे हँसने की थी. द, ढ, ध, ड हमारे यहाँ ४ होते हैं. और अच्छी बात ये है कि जो लिखा है वैसा ही पढ़ा जायेगा. उसने काफी देर प्रयास किया पर ढ और ध उनके लिए इतने आसान थोड़े न हैं. कुछ समय रहने के बाद हमारा विश्वास और भी दृढ हो गया कि देवनागरी का कोई विकल्प नहीं है.
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पिछले दिनों इस्कॉन के एक मंदिर में जाना हुआ. इस्कॉन माने  इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्सियसनैस. स्वामी श्रील प्रभुपाद ने बहुत बड़ा काम किया है. पूरी मानवता को उद्धार के लिए हमारे कृष्ण के पास लाने का. अब विदेशी भी भारतीय ग्रंथो को पढने लग गए हैं. भगवद चर्चा चली तो बात निकली कि ब्रह्म की जिज्ञासा करनी चाहिए. ब्रह्म कौन हैं, इसमें द्वैत और अद्वैत में मतभेद है. ब्रह्म दोनों में हैं. अद्वैत मत कहता है कि सब ब्रह्म ही है, यदि कुछ और दीखता है तो वह माया के कारण है. द्वैत मत के अनुसार ब्रह्म है और प्रकृति है. जो ब्रह्म के अतिरिक्त है वो प्रकृति है. एक भक्त ने बात उठाई कि मात्र ब्रह्म की पूजा हो सकती है, अब यदि मैं कृष्ण, शिव किसी को भी पूजूं पूजा तो ब्रह्म की ही होगी. दूसरे ने निराकरण किया, नहीं कृष्ण और शिव अलग अलग हैं. यहाँ तक कि कृष्ण के अलग अलग अवतार भी अलग अलग हैं. इनमे से जिसे पूजोगे उसी को प्राप्त होगे. मेरे मन में अलग प्रश्न उठ रहा था. शिव शिव कहने से कृष्ण को प्राप्त नहीं होंगे? कृष्णा कृष्णा कहने से कृष्ण को प्राप्त होना तर्कसंगत है क्या? कृष्णा तो द्रौपदी को कहते हैं न. मुझे पता है कि मेरा संदेह निरर्थक है. भावना से की गयी भक्ति वहीँ पहुचाती है जिसकी भावना की गयी हो. मुंह से क्या कह रहे हैं इससे अधिक अंतर नहीं पड़ता. मैं भक्ति की बात कर रहा हूँ. भूत प्रेत की आराधना करने वाले गलत मंत्र पढेंगे तो पिटाई होनी निश्चित है.

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समस्या यह है कि कृष्ण का कृष्णा हो गया. क्रिष्ण, कृष्न, या क्रिश्न, कृष्ना भी हो सकता है, हो ही जायेगा. हमारे देश के एक महा योगगुरु हैं. मैंने उन्हें अक्सर प्रज्ञा को प्रग्या न कह कर प्रज्यां कहते सुना है. ये यज्ञ को यग्य नकहकर यज्य कहते हैं. अब क्या सही है ये तो व्याकरण के आचार्य ही बताएँगे. हम तो बचपन से जो पढ़ते आ रहे हैं. जो कबीर ने लिखा कि कहे कबीर गुरु ग्यान ते, यह ज्यान का अपभ्रंश तो नहीं हो सकता. मुद्दे की बात यहाँ यह है कि रोमन लिपि में हिंदी लिखने से हिंदी के कुछ शब्द अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं. आने वाले कुछ समय में श तो बचेगा क्योंकि वो एग्जामिनेशन में है पर ष गायब हो जायेगा, ऊपर दिए गए ड, द ही बचेंगे. क्ष, त्र के गायब होने कि सम्भावना हो सकती है. और साथ ही विभिन्न प्रकार के र जैसे कि दर्प, पृथ्वी, त्रुटी में अंतर करना असंभव हो जायेगा.
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कभी अगर इन्टरनेट पर कोई संस्कृत का प्रमाणिक ग्रन्थ ढूंढना हो तो अधिकतर परिणाम आंग्लभाषा में ही आते हैं. ग्रन्थ भी रोमन में लिखे हुए होते हैं. च बनाने के लिए C के ऊपर एक आड़ा डंडा और भी नाना प्रकार की नुक्ताचीनी करके देवनागरी का विकल्प बनाने का प्रयत्न किया जाता है. इन सब के पीछे तर्क यह है कि अगर ये न करें तो अहिन्दीभाषी इन्हें कैसे पढेंगे. पर समस्या यह है कि एक तो मूलपाठ नष्ट हो जाता है और दूसरे इन्हें हिंदी भाषी भी पढ़ते हैं और अगर किसी शब्द को उन्होंने पहली बार देखा है तो वो त्रुटि पूर्ण रूप में उनके मस्तिष्क में अंकित हो जाता है. ऋषिवर पाणिनि ने बड़े प्रयत्न के बाद ये महान वर्णमाला बनायीं थी. इसे ऐसे ही नष्ट हो जाने देंगे क्या.
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अवस्था इतनी ख़राब है कि संस्कृत शब्द के उच्चारण पर भी भ्रम की स्थिति है.  samskritam कहने वालों की कमी नहीं है और अगर कुछ कहो तो हार्वर्ड और जाने कहाँ कहाँ से परिभाषा निकाल निकाल केसामने रख देंगे.
ऐसा लगता है कि देवनागरी के भक्तों को आक्रामक होना होगा. विदेशी भाषाओँ के ग्रंथों का अनुवाद नहीं लिप्यान्तरण करना होगा. देवनागरी में. जिससे कि विदेशियों को पता चले कि क्या है देवनागरी, वे इसमें व्यवहार करना आरम्भ करें. हमारे यहाँ के काले अंग्रेज भी तभी फिर से देवनागरी में लिखना आरम्भ करेंगे जब उन्हें बाहर से प्रेरणा आएगी. स्वामी श्रील प्रभुपाद यही विचार लेकर बाहर गए थे.
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चलते चलते.


मेरे साथ आनंदन मेरे दल के प्रमुख हुआ करते थे. हिंदी सीख रहे थे. उन्हें बड़ी समस्या थी कि कैंटीन में चाय तक नहीं मांग पाते. मेरे साथ हिंदी चलचित्र देखने जाते, मैं अनुवादक की भूमिका निभाता था. एक दिन बड़े प्यार से मेरे कंधे पर हाथ रख कर बोले. 'बाई, चाय के बारे में क्या विचार है'. साथियों के ठहाकों के बीच मैंने हँसते हुए कहा बाई नहीं भाई कहो भाई. उन्होंने फिर प्रयास किया पर बात बनी नहीं. मैंने रामबाण समझ कर कहा बोलो, 'मेरा भारत महान'. उन्होंने कहा, 'मेरा बारत महान'. मैंने उन्हें उनके कंप्यूटर में रिकॉर्ड करके दे दिया और कहा, प्रयास करते रखो, तब तक मुझे बाई ही बने रहना पड़ेगा. सौभाग्य से  आनंदन को भ कहना आ गया और मुझे उनके मुख से भाई और मेरा भारत महान सुनने का अवसर मिला.

Monday, 22 February 2010

हिंदी में अन्य भारतीय भाषाओँ के शब्दों का प्रयोग

ब्लोगवाणी के पन्ने पलटते पलटते एक लेख दिखाई दिया. समयाभाव के कारण केवल शीर्षक ही पढ़ पाया. शीर्षक ही अपने आप में इतना आकर्षक था कि मन में उथल पुथल कर गया. हिंदी का प्रयोग करते समय अंग्रेजी का प्रयोग करना चाहिए कि नहीं. वैसे आजकल सामान्य बोलचाल में अंग्रेजी का प्रयोग बहुत ही आम हो चुका है. इसे हिंगलिश कहते हैं. मजे कि बात ये है कि इस प्रकार के शब्द अन्य देशों में भी प्रचलित हैं. डेनमार्क में डेंगलिश यानि कि डेनिश + इंग्लिश बोलते हैं. शायद ऐसा ही अन्य जगह पर भी होगा. यहाँ तक कि चीन में तो पढ़े लिखे नौजवानों में एक अलग फैशन है. वे दो नाम रखते हैं. एक चीनी और एक उससे कुछ कुछ मिलता जुलता अंग्रेजी नाम.
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हिंदी में हिंदी से इतर भाषाओँ के शब्दों का प्रयोग नया नहीं है. सदल मिश्र और भारतेंदु के समय से ही ये बहस का और विवाद का मुद्दा रहा है कि कैसी हिंदी में लिखा जाये. उर्दू मिश्रित, जो एक तरह से उर्दू का देवनागरी रिप्लेसमेंट है, बृज या अवधी मिश्रित हिंदी, खडी बोली या संस्कृतनिष्ठ हिंदी जो हिंदी को हिंदी की माता यानि कि संस्कृत से जोडती है.
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हिंदी की शुरुवात वर्तमान हिंदी क्षेत्र के विभिन्न क्षेत्रों में बोली जाने वाली विविध क्षेत्रीय भाषाओँ में रचे गए ग्रंथों से हुई थी. वे ग्रन्थ अगर आज हिंदी का ज्ञान बघारने वाले किसी स्नातक को भी पकड़ा दिए जाएँ तो वो शायद उनका आंशिक मतलब ही समझ पायेगा. हिंदी ने क्षेत्रीय भाषाओँ से लेकर फारसी के शब्दों तक को अपने में समाहित किया है. गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों के शब्दों ने भी इसमें पैठ बनायीं है. इडली, डोसा, साम्भर, मिष्टी, खोता, खूब भालो, ये कुछ ऐसे शब्द हैं जो जाने कब हम हिंदी भाषियों के अंतर में जगह बनाकर बैठ गए.
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अब एक लाख टके का सवाल... क्या इन नए शब्दों के आने से हिंदी भ्रष्ट हो गयी. या फिर ये और भी वैभवशाली हो गयी है, और भी धनी हो गयी है. निस्संदेह और भी अधिक धनी हुई है. ये हिंदी में घुसी उर्दू ही है जिसने हमें कम से कम इस लायक बनाया है कि हम किसी भी अरब से बिना झिझक कह सकें, आदाब, या खुदा हाफिज़. मुझे एक जोर्डन की महिला मिली थी और मिलते ही जब मैंने उसकी गुड मार्निंग का जवाब आदाब से दिया तो वो कृत कृत्य हो गयी. उसके चेहरे पे जो ख़ुशी थी वो देखी जा सकती थी. अब भले इसके आगे मुझे उसकी जबान का एक शब्द न आता हो, हमने वो पल तो जी भर के जी लिया. मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने के अतिरिक्त भाषा का और क्या उपयोग है भला?
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अंग्रेजी और हिंदी तो वैसे भी एक ही भाषा परिवार से ताल्लुक रखती हैं. अंग्रेजी में संस्कृत से गए बड़े सारे शब्द हैं. अकेले शैक्सपियर ने लैटिन और अन्य भाषाओँ से निकाल निकाल के सोलह सौ से अधिक नए शब्द अंग्रेजी में डाल दिए. आज वे शब्द बड़े गर्व से  कहते हैं की उनका रूट यानि कि जड़ फलां फलां भाषा से आया है. तकरीबन हर भाषा की विकास यात्रा ऐसी ही होती है. संस्कृत शायद एक मात्र अपवाद है.
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हजारों वर्षों की गुलामी ने हमें कुछ अधिक ही रक्षात्मक बना दिया है. हमें बहुत सी कायदे की बातों को स्वीकार करने में भी गुलामी का बोध होता है. यहाँ इस बात पर जोर नहीं दिया जा रहा है कि हिंगलिश बोलना चाहिए.  अपितु मात्र उन विदेशी शब्दों को हिंदी में स्थान देना चाहिए जिनके बिना काम न चले, जिन विचारों को व्यक्त करने वाले शब्द हिंदी में हों ही न. वैसे ऐसे शब्दों की सूची बहुत अधिक नहीं होगी. ज्यादातर ऐसे शब्द पहले ही हिंदी में स्थान पा चुके हैं.  यहाँ यह कहा जा रहा है कि हैदेराबादी हिंदी जैसी हिंदी से मनोरंजन होता है यदि किसी को उसमे लिखना है तो लिखता रहे. साहित्यिक हिंदी से गरिमा का बोध होता है. ऐसा लिखें कि हिंदी की गरिमा भी बढे और वह जन साधारण के पास भी आ पाए.
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साहित्यिक हिंदी के आलोचक कहते हैं कि यह आम जनता की भाषा नहीं है और इसका वही हाल होगा जो इसकी माता संस्कृत का हुआ है. उन्हें यह सोचना चाहिए कि संस्कृत तो आज भी अपने मूल रूप में जिन्दा है. इसकी समकालीन अन्य भाषाएँ पाली और प्राकृत के बारे में कितने लोग जानते हैं? ठीक उसी तरह अगर हिंदी के बोलने वाले कम हुए तो इसके विभिन्न अपभ्रंश पूर्णतः गायब हो जायेंगे.
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मात्र हिंदी के अस्तित्व पर संकट नहीं है, सभी क्षेत्रीय भाषाएँ अपनी अपनी गरिमा के लिए संघर्ष कर रही हैं. क्यों न यह लडाई अलग अलग एवं एक दूसरे के साथ लड़ने के बजाय एक साथ मिल कर लड़ी जाये. क्यों न भारत वर्ष की सभी भाषाएँ संकोच छोड़ कर एक दूसरे के शब्दों को बेहिचक अपने में स्थान दें. हर भाषा के लेख अन्य लिपियों में भी लिखे जाएँ. वैसे भी हर भाषा में ८० प्रतिशत तक संस्कृत से आये हुए शब्द हैं. इस हिसाब से सभी भारतीय भाषाएँ मूलतः एक रूप हैं. हर एक भाषा को स्वयं को विस्तृत करने की आवश्यकता है. यह पराजय नहीं अपितु विजय है, संयोग को पराजय का नाम देना कहीं से भी बुद्धिमानी नहीं है.
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विद्वत जनों से अपेक्षा है कि वे इस विषय में नायकों की भूमिका निभाएंगे. यदि व्याकरण के नियमों में यत्र तत्र किंचित परिवर्तनों की आवश्यकता है तो वे आगे आकर अपनी भूमिका का निर्वहन करें. महान राष्ट्र बनने के लिए इस राष्ट्र को एक योगी बनने की आवश्यकता है. और योग का मतलब होता है सृष्टि से और ईश्वर अर्थात सत्य से एक रूपता प्राप्त करना. है न. आओ हम अपने राष्ट्र रुपी शरीर में आने वाले विविध विचारों को सर्वत्र संचारित करने वाली प्राण स्वरूपिनी भाषाओँ को एक दूसरे में लय कर लें.
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जय भारत
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Monday, 15 February 2010

दलित हैं, हमेशा नहीं रहेंगे.

पिछले दिनों एक लेख पढ़ा. लेख महंगाई और दलित चिंतन से सम्बंधित था. लेखक महोदय का मत था कि महंगाई से मात्र अगड़ों को समस्या है दलितों को नहीं. दलित तो पहले भी अच्छा नहीं खा पाते थे. आज गेंहू खा रहे हैं. सोना पहन रहे हैं. जबकि महंगाई के चलते तथाकथित अगड़े अपने हाई प्रोफाइल जीवन शैली से निम्नतर जीवन जीने के लिए मजबूर हो रहे हैं. इस तरह से लेखक महोदय की समझ में अगड़ों और दलितों का भेद दूर हो रहा है.
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जय महंगाई माता की. चलो जो काम बड़े बड़े सुधारक न कर सके वो महंगाई ने कर दिखाया.

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बड़े बड़े लेखकों की कलम से ऐसे ऐसे तीर चलना निश्चय ही रोंगटे खड़े कर देता है. समाज के विभिन्न वर्गों के बीच भेदभाव यदि किसी अच्छाई की वजह से मिटे तो समझ में आता है, पर मान लीजिये किसी कार दुर्घटना में अगड़े मंत्रीजी और उनका दलित ड्राईवर चल बसें , तो क्या ये खुश होने की बात है कि देखो कितना सही ट्रेफिक प्रॉब्लम था, समाज का इतना बड़ा भेद मिट गया. दोनों कुत्ते की मौत मर गए.

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महंगाई की वजह से सब गरीब हो रहे हैं. ये रोने की बात है न कि खुश होने की. दलित, समाज का कोई वर्ग विशेष नहीं है जो हमेशा ठीक ठीक निर्धारित किया जा सके. ये एक अवस्था है समाज के एक दायरे की. ये दायरा हमेशा पिछड़ा और उपेक्षित ही रहता है चाहे किसी की सरकार हो, कोई भी विधान हो. दायरे में कौन रहेगा ये जरूर निश्चित नहीं है. इसमें रहने वाले लोग बदलते रहते हैं. एक बानगी देखिये.

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मनु स्मृति में दलित दलित हैं. इस्लाम के राज्य में गैर इस्लामी दलित हैं. नाजियों के राज में यहूदी दलित हैं. चीन के राज में तिब्बती दलित हैं. कम्युनिस्टों के राज में गैर कम्युनिस्ट दलित हैं. पूँजीपतियों के राज्य में कामगार दलित हैं. अरब में भारतीय उपमहाद्वीप के लोग दलित हैं. अमेरिका और यूरोप में अफ़्रीकी दलित हैं.  वर्मा में उनकी खुद की सेना का राज है धर्मं भी बौद्ध है पर देशवासी दलित हैं. और भ्रष्ट तंत्र में आम जनता दलित है.

नालायक बहू बेटों के घर में वृद्ध माता पिता दलित हैं. रूढ़िवादी परिवार में लड़कियां दलित हैं. 
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दलित उत्थान कैसे होगा? जो भुगत रहा है वो दलित है. जो अत्याचार कर रहा है वो दबंग है. ये जेनेटिक नहीं है. ये मनःस्थिति है. दबंग को ज्ञान नहीं कि जो कर रहा है वो गलत है और अगर मजबूर को दबाने की जगह उसकी मदद करेगा तो ज्यादा आनंद मिलेगा. मजबूर को ज्ञान नहीं कि वो क्या करे जिससे उत्पीडन मिटे. कई बार ज्ञान होता है पर सामर्थ्य नहीं होती कि आवाज उठाये.

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जरूरत इस बात की है कि मनुष्य के सर्वांगीर्ण उत्थान पर ध्यान दिया जाये. एक अतिशिक्षित समाज में उत्पीडन के अवसर कम होते हैं. सारी दुनिया में नस्लवाद है पर उन जगहों पर नहीं है जहाँ शिक्षा का स्तर ऊंचा है. भारतीय संविधान सभी को एक समान अधिकार की गारंटी देता है. मनु स्मृति को पूछने वाला आज कोई नहीं है. फिर इस बात की क्या आवश्यकता है कि संविधान प्रदत्त अवसर का उपयोग करने की जगह भुला दिए गए धर्मं ग्रंथों को कोसा जाये?
मनुष्य को अपनी स्थिति का आकलन स्वयं करना चाहिए. भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले सभी लोगों की जेनेटिक संरचना समान है. भूतकाल में कुछ वर्ग प्रगति कर गए और कुछ नहीं कर पाए इसका खामियाजा सभी को उठाना पड़ा है. देश गुलामी के गर्त में चला गया था. इस बात को सभी स्वीकार कर चुके हैं.

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जो आज भी हजारों साल पुराने भेदभाव की बात करते हैं वो नहीं चाहते कि मनुष्य विकास क्रम में आगे बढे. और हो भी क्यों न, इससे कुछ लोगों की सरकार चलती है. क्या जनता के वोट का उपयोग करने में और बाद में उसे दर्शन के लिए भी तरसा देने में शोषण नजर नहीं आता? वर्ग भेद तो हमेशा था और ऐसे ही चला तो हमेशा रहेगा.

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हर देशवासी से अनुरोध है कि किसी का शोषण न करे, इसमें जो आनंद है वो तामसिक है, यह आपके मन को और क्लेश देगा. इसके बजाये सबकी सहायता करें. लोगों को दया की भीख भी न दें बल्कि उनमे आत्मविश्वास भरें. उनकी क्षमताओं को निखारने में अपना योगदान दें. सबसे अधिक आनंद अपनी संतान को समर्थ बनाने में और उसके आनंद में आनंदित होने में आता है. जो मजबूर हैं उन्हें समर्थ बनायें. उन्हें ऐसे संस्कार दें कि वे भी किसी दुर्बल का शोषण न करें अपितु उसकी सहायता करें.

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जो अपने को दलित समझते हैं, वे इस बात का भान करें कि यदि उनमे और दूसरों में कोई अंतर है तो वो अवसर का है. नस्ल या जाति का नहीं. इस बात का अनुभव करें कि यदि आप समर्थ होंगे तो अपने आप इस दायरे से बाहर निकल जायेंगे. पर स्मरण रखें कि यदि आप समर्थ बन जाते हैं तो आपका सामर्थ्य दूसरे मजबूरों की सहायता करने में काम आये.
हम एक धरा, एक माँ भारती की संतति हैं. हम में  उपासना पद्धति का भेद हो सकता है. हमारे रंग में भेद हो  सकता है. पर हमारा रक्त एक है. हमारे हित एक हैं. जब सब आगे बढ़ेंगे हम भी बढ़ जायेंगे इस भावना से एक दूसरे की सहायता करें और सतत प्राणायाम के अभ्यास से आपने मन के मैल को मिटा ले.

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संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम. देवा भागं यथापूर्वे संजानाना उपासते ।।‘

हम साथ चलें , साथ बोलें, एक दूसरे के मन को समझें. जिस प्रकार से पूर्व काल में श्रेष्ठ जन आचरण किया करते थे.
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जय भारत.

वृहत्तर भारत की कल्पना

आज अचानक ये बात मन में आ गयी. यहाँ विदेश में घूमते घूमते बहुत से अफ़गानिस्तान वालों से मुलाक़ात होती है. लगभग हर अफ़गानी टैक्सी वाले के पास हिंदी गानों की कोई न कोई कैसेट होती है. वे भारत से बेइन्तेहा प्यार करते हैं. उनके लिए भारत उनके दिल के करीब है. ज्यादातर अफगान मानते हैं कि भारत उनका भला चाहता है.
अफ़गानिस्तान का भारत के इतिहास में बहुत बड़ा योगदान है. हमारे इतिहास के कई महत्त्वपूर्ण चरित्र अफगानिस्तान में पैदा हुए. पाणिनि, गांधारी के समय से ही अफगानिस्तान भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग रहा है.
यह गुप्त वंश, मौर्य वंश, कनिष्क, लगभग संपूर्ण मुग़लकाल, और महाराज रणजीत सिंह के समय भारत का अंग भी रह चुका है. अंग्रेजों के समय में सिख राज्य की समाप्ति के बाद अफ़गानिस्तान राजनैतिक रूप से भारत से अलग हो गया.
आजादी के बाद से ही भारत और अफ़गानिस्तान के बीच प्रगाढ़ सम्बन्ध रहे हैं. रूस और अमेरिका की आपस की खींचतान ने अफ़गानिस्तान को सुर्खियों में आने के सारे गलत कारण दे दिए. ये भारत और अफ़गानिस्तान के आपसी संबंधों को बड़ा झटका था.
अमेरिका द्वारा अपनी गलती सुधारे जाने के बाद आज फिर से वहां भारत की मौजूदगी महसूस की जा सकती है. भारतीय कंपनियों ने वहां अच्छे विकास कार्यों के कारण वहां की आम जनता का दिल जीत लिया है.
अफ़गानी स्वभावतः निर्भीक, और स्वाभिमानी लोग हैं. अफगान समाज छोटे छोटे कबीलों में बँटा हुआ है. रूसियों ने वहां के सामाजिक ताने बने में परिवर्तन करने की कोशिश की इसलिए वे असफल हो गए. इन्ही कारणों से अँगरेज़ भी असफल हुए थे. और अगर ऐसा ही चलता रहा तो अमेरिका के सफल होने के अवसर भी कम ही हैं.
एक ताकतवर और सुशिक्षित अफ़गानिस्तान विश्व शांति के लिए अति आवश्यक है. विशेषतः भारत के भविष्य के लिए तो बहुत ही ज्यादा.
इस बात में संशय है कि वे अपने आप इतना आगे बढ़ पाएंगे. दूसरी ओर हमारे बाकी पडोसी भी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं हैं. सभी के साथ कोई न कोई समस्या है और धीरे धीरे चीन उन्हें हमसे दूर करता जा रहा है.
अफ़गानिस्तान के पास व्यापक तेल व गैस भण्डार हैं. इसी वजह से सबको उसमें रूचि है.
ऐसी विषम परिस्थिति में वृहत्तर भारत का सपना साकार करने की दिशा में एक प्रयास किया जा सकता है. हमें सबकी और सबको हमारी जरूरत है. हमारे धर्मं निरपेक्ष ढांचे में सब समा सकते हैं. ये कतई जरूरी नहीं कि सब वर्तमान भारतीय संविधान को माने, शुरुआत में एक स्वतंत्र देशों के राष्ट्रकुल की तर्ज पर एक विदेशनीति, एक रक्षानीति  और मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाया जा सकता है. कालांतर में शिक्षा के द्वारा मनभेद भी दूर किये जा सकते हैं.
इस प्रकार जो नया राष्ट्र जन्म लेगा वो दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्रों में से एक होगा. इससे हमें चीन को मध्य एशिया के राज्यों के साथ मिलकर घेरने में मदद भी मिलेगी. एक शक्ति संतुलन स्थापित होगा.
हमारे ऊपर है कि इसे एक बेकार का विचार मान कर फेक दें या सामूहिक संकट के समय आये हितैसी विचार जैसा जानकर इसे पालें और मूर्तरूप दें.
जय भारत.

मास्टर जी की आ गयी चिट्ठी

अनन्या सो रही है. रात को यू टयूब पर गाना सुनते सुनते उसे नींद आ गयी थी. वो अब एक साल की होने वाली है. उसके दिन भर के क्रियाकलापों में मस्ती करना, अपने आप चलने की कोशिश करना और अपने पसंदीदा गाने सुनना शामिल है. लकड़ी की काठी, बन्दर ने खोली दूकान, नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए, मास्टर जी की आ गयी चिट्ठी – इन सब गानों में बहुत छोटे छोटे बच्चों को भी आकृष्ट करने की असीम क्षमता है. बच्चे पहचान लेते हैं की कौन सा गाना उनका है और कौन सा नहीं. मैं तो एक दिन ख़ुशी से उछल पड़ा जब मैंने देखा कि एक गाने में बिल्ली को म्याऊँ करते देख कर उसने भी बोला ‘म्याऊँ’. गुड लर्निंग – है ना. अंग्रेजी गाने भी बच्चों का ज्ञान बढ़ाते हैं जैसे ट्विंकल ट्विंकल लिटल स्टार अगर उन्हें इशारों के साथ गाया जाये.
बच्चे माता पिता से बहुत सीखते हैं. और हो भी क्यों ना इसीलिए तो कहते हैं कि माता पिता के संस्कार बच्चों में आते हैं. माँ को तो प्रथम गुरु कहा गाया है. वो जो सिखा दे बचपन में, बच्चा वैसा ही हो जाता है. हर माँ को चाहिए कि अपने बच्चे को उत्तम संस्कार दे. शिवाजी महाराज की माँ उन्हें गीता और रामायण की कहानियां सुनाया करती थीं. और अभिमन्यु का किस्सा तो आपको याद होगा ही. पिता से बच्चे में स्वावलंबन के गुण आते हैं. पिता से बच्चा सीखता है कि वृहद् महत्व के मुद्दों से कैसा निपटा जाये. बचपन तो होता ही आनंद के साथ सीखने के लिए है. आस पास के लोग, परिचित, बालसखा, किन्टर गार्डन या स्कूल के टीचर, ये सभी कहीं ना कहीं गुरु की भूमिका का निर्वहन करते हैं. हमारे स्कूल में साथी बच्चों ने एक गेम बनाया था. जियोग्राफी कि बुक में से मेप निकाल के एक बच्चा किसी स्थान का नाम देखता था और फिर बाकी से उसे ढूँढने को कहता था. इस क्रम में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के सारे जिले मय लोकेशन के याद हो गए. फिर यही क्रम हमने विभिन्न राज्यों के साथ दोहराया. फिर विश्व मानचित्र का नंबर आया. ५वी कक्षा पास करते करते लगभग विश्व के सारे शहर मय लोकेशन के याद हो गए थे. आजकल फ़िल्मी गीतों की अन्त्याक्षरी का बहुत चलन है. हमने यही काम देश दुनिया की विभिन्न जगहों के साथ, महापुरुषों के नामों के साथ किया. बहुत मजा आया और पढाई की पढाई.
हमारे स्कूल में एक अध्यापक थे श्री एच एन साहू, वे हर वस्तू को बड़ी वैज्ञानिक दृष्टि से देखते थे. उन्होंने हमें ढेर सारे प्रयोग कराये. ऐसा चाव लगा फिजिक्स का कि दिन दिन भर लैब से नहीं निकलते थे. नतीजा ये हुआ कि जब एग्जाम हुए तो बाहर से आये परीक्षक देख के दंग रह गए कि इस स्कूल के बच्चे इतने प्रयोग कैसे कर सकते हैं. आज उनकी बड़ी याद आती है . मेरे इंजीनियर बनने में कड़ी मेहनत के साथ साथ ऐसे श्रेष्ठ अध्यापकों का बड़ा योगदान है.
बहुराष्ट्रीय कम्पनी ज्वाइन करने के बाद देखा कि यहाँ सीखने पर बड़ा जोर रहता है. सोफ्ट्वेयर के क्षेत्र में तो वैसे भी नित नए नए परिवर्तन आते रहते हैं. अगर सीखने का गुण नहीं है तो बड़ी मुश्किल होगी. यहाँ प्रौद्योगिकी के साथ साथ प्रबंधकीय कौशल, एक से अधिक भाषाओँ का ज्ञान और भी कई सारे विषयों का अच्छा ज्ञान होना आवश्यक है.
सीखने की बात हो और गूगल एवं विकिपीडिया  की बात न हो तो मजा नहीं आएगा. अब तो साधारण सी बात के लिए भी गूगल पर सर्च करना आम हो गया है. कोई एकेडेमिक टॉपिक हो तो सर्च रिजल्ट विकी पर ही लेकर जायेगा. विकी ज्ञान का भण्डार है. एक बात जो ठेस पहुचाती है वो यह कि भारतीय भाषाओँ में अधिक लेख नहीं हैं. शायद कोई लिखना नहीं चाहता. अगर ये सब ज्ञान का भण्डार भारतीय भाषाओँ में खुल गया होता तो हमारे लोगों को बहुत लाभ होता. दूसरी बात यह कि हर खोज के लिए पुरातन ग्रीस की तरफ इशारा कर देते हैं. हमारे पूर्वजों के किये किसी खोज का रिकॉर्ड या तो प्रकाशित नहीं किया जाता या उसे दोयम दर्जे की तरह प्रस्तुत किया जाता है. इसका एक ही इलाज़ है. हम प्रयास करें कि अधिक से अधिक लेख, अधिक से अधिक वेब साइट्स बनायें और हमारे लोगों के अविष्कारों को उचित स्थान दिलाएं. अगर हिंदी में सारा ज्ञान आसानी से मिलेगा तो लोग हिंदी में काम करने में अधिक उत्साह दिखायेंगे.
हमारी मातृभाषा हिंदी है. हिंदी की भी एक माता है – संस्कृत. संस्कृत में हिंदी से ज्यादा ज्ञान का कोष छिपा हुआ है. इसे पढने के अपने फायदे हैं. कहते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले जर्मनी वाले बहुत सारा संस्कृत साहित्य ले गए थे. उन्ही से प्रेरित होकर उन्होंने बड़े भारी अस्त्र शस्त्र बनाये. संस्कृत का तो एक और भी लाभ है. संस्कृत बोलना यानि कि दिन भर प्राणायाम. नित्यप्रति नवीनतम शोधों में प्रमाणित किया जा रहा है कि संस्कृत पढने से स्मृति बढती है.
यह तो सब लौकिक व्यवहार की वार्ता हुई. मानव जीवन का उद्देश्य अन्य प्राणियों से अलग है. बाकि सब भोग योनियाँ हैं और मानव देह प्राप्त करना मुक्त होने का एक अवसर है. चाहे तो अन्य जीवों की तरह जीवन जी कर के फिर बार बार के आवागमन के फेर में पड़ जाये, चाहे तो जीवन को सार्थक करके मुक्त हो जाये. ये अवसर आध्यात्मिक गुरु की कृपा से फलित होता है. मैं भी एक महान अवतार पुरुष की कृपा से कृत कृत्य हुआ हूँ. आप सब उन्हें जानते भी हैं. श्री श्री रविशंकर जी चारों दिशाओं को अपने तेज़ से देदीप्यमान कर रहे रहे. वे इराक एवं पाकिस्तान तक गए हैं  और भारत में भी दूर दूरस्थ स्थित भाग्य और अशांति के मारे हुओं को उत्थान का मार्ग दिखा रहे हैं. यहाँ स्वीडन में भी उनकी एक शाखा है. उनके बताये तीन सूत्रों में सारा जीवन दर्शन छिपा है. अपने लिए ध्यान साधना, दूसरों के लिए सेवा और सबके आनंद के लिए सत्संग. संसार के सताए हुए मन को और क्या चाहिए. इस विषय पर शेष वार्ता फिर कभी.
ओहो अनन्या के जागने का समय हो गया है. मैं भागता हूँ, अभी उसके लिए पपीते का शेक बनाना है जो उसे अत्यंत प्रिय है. और साथ साथ गाना भी तो गाना है. आ आ ई ई मास्टर जी की आ गयी चिट्ठी.  आप सभी पाठकों को सप्रेम नमस्कार. फिर मिलेंगे. जय भारत.

Friday, 15 January 2010

अथातो ग्रहण जिज्ञासा

देखो पापा ये सफ़ेद रौशनी का बिम्ब अब धीरे धीरे इस काली छाया से स्थानापन्न होता जा रहा है. बच्चे की आवाज में प्रसन्नता मिश्रित कौतूहल था. उसने सुबह से जो श्रम किया था अब उसका  पारितोषक प्राप्त होने का समय था. पिता ने बालक की प्रसन्नता में भागीदार बनते हुए सफ़ेद गोले को देखा. फिर कहा अब जाकर के टीवी में भी इमेज देख आओ. बच्चे ने टीवी की ओर देखा. हम्म्म ये तो लगभग ऐसा ही है पर कितना अच्छा होता कि हम भी ऐसे विडियो बना पाते. पिता ने कहा बड़े होकर के अपना कैमरा लेना फिर विडियो भी बना लेना. अभी एक्स रे फिल्म से देख लो पर सीधे मत देखना, पिता के स्वर में गंभीरता का पुट था. बच्चे से अलमारी खंगाली. इसमें था न एक्सरे, कहाँ गया? पूरा परिवार एक्सरे ढूँढने में लग गया पर वो नहीं मिला. दूर नए पडोसी के बच्चे एक्सरे से ग्रहण देख रहे थे. पास जाने में संकोच हुआ. लगा कि कहेंगे कभी तो आते नहीं, अब मजे लेने हैं तो आ गए. बच्चा नहीं गया. मन में सुकून था. अपने बनाये यन्त्र से ग्रहण के प्रभाव को तो देख लिया. और किसी ने इतना दिमाग लगाया क्या. उसने कई दिन से इस विषय के बारे में अध्ययन करना शुरू कर दिया था. घर में रखे ग्रहलाघव को ज्यादा न समझ आते हुए भी कई बार पढ़ डाला था. दैनिक उपयोग के पंचांग ने भी उसकी समझ में वृध्दि की थी.  बीच बीच में माँ आ कर टोकती थी, ग्रहण में कितना ऊधम कर रहे हो. बच्चे ने ग्रहण का अनुभव कर लिया था पर अब उसकी नजर आस पड़ोस के पालतू जानवरों पर थी. ये इतने डरे हुए क्यों हैं? ये पक्षी अभी तो इस तरफ गए थे जैसे रोज सुबह जाते थे. आज शाम की बजाय अभी से वापस क्यों जा रहे हैं? ये बिल्ली  छिप के घर के अन्दर क्यों बैठी है. इन सवालों का क्या जवाब है? हैरानी से पिता की ओर देखा, उन्होंने अख़बार बढ़ा दिया. बच्चे ने बहुत सोच विचार कर के अपना उत्तर ढूंढ लिया. बहुत से मनुष्य भी डरे हुए हैं. दोनों के डरने के अलग अलग कारण हैं. वे शायद दो कारण हैं. प्रथम तो उन्हें पता नहीं है कि क्या हो रहा है, वे इसलिए डरे हैं कि आज ये सब कुछ विचित्र क्यों हो रहा है. दूसरे इस वजह से डरे हैं कि उन्हें यह ही  सिखाया गया है कि डरो. हर उस चीज़ से डरो जो समझ नहीं आती. जिन्होंने लिखा था कि ऐसा मत करो वैसा मत करो उन्होंने शायद कुछ अध्ययन करके लिखा था. जो भी ज्ञात अज्ञात साधन थे उनके आधार पर अध्ययन किया था. उनकी सोच सूक्ष्म थी. पर इन डरने वालों ने उनके एक एक शब्द को परी कथा की तरह से रट लिया. उन्होंने कहा कि ईश्वर का ध्यान करो. मनुष्यों ने अर्थ लगाया कि कुछ अशुभ होगा इसी लिए ईश्वर के ध्यान को कहा है.  उन्होंने कहा कि ग्रहण के बाद नहा लेना. मनुष्यों ने अर्थ लगाया कि अशुद्ध हुए होंगे इसलिए नहाने को कहा है. बच्चे ने सोचा कि ध्यान लगा के देखते हैं क्या होगा. वो एक जगह शांति से बैठ गया. वाकई लगा कि आज कुछ भिन्नता है. अखबार में लिखा था कि जानवरों के भयभीत होने का कारण उनकी जैव घडी में बदलाव होना है जिसे वे समझ नहीं पाते. मनुष्य भी तो जानवर ही है. जब तक ज्ञान नहीं जानवर ही तो है. बच्चा इतना नासमझ भी नहीं था. जानता था कि  विज्ञान में हर सिद्धांत एक परिकल्पना ही तो होता है. एक ऐसी परिकल्पना जो प्रयोगों के द्वारा पुष्ट हो गयी हो. अब तक टीवी पर भांति भांति के विचार सुन कर समझ चुका था वैज्ञानिक ग्रहण को ले कर इतने उत्साहित क्यों होते हैं. उन्हें मौका जो मिलता है ब्रम्हांड के रहस्य जानने का. हीलियम भी तो सूर्य ग्रहण कि वजह से ही खोजा गया था. इसी वजह से ही तो आइन्स्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत को सर्व मान्यता मिली थी. पर जो उसकी समझ में नहीं आ रहा था वो यह कि इसमें ध्यान या पूजा पाठ क्यों करते हैं? ध्यान करना तो अच्छी  बात है रोज करना चाहिए पर ग्रहण में क्यों इतना जोर दे कर के कहा है. माँ के पास गया. उत्तर मिला कि अशुभ से बचने का एक मात्र सहारा ईश्वर ही तो है. तर्क जोरदार था और सत्य भी. किन्तु कोई और भी कारण होगा. पिता के पास गया. पिता ने कहा कि जिसने कहा है कि ध्यान करो उसी ने और भी कारण बताये होंगे.  बोलो संसार कितने तत्वों से मिल कर बना है? बच्चे ने कहा पांच. बहुत अच्छे, अब ये बताओ ग्रहण कैसी घटना है? आकाशीय, बच्चों के पास बहुत से प्रश्नों के अतिरिक्त बहुत से उत्तर भी होते हैं. क्या शरीर में आकाश नहीं होता? पिता ने फिर पूछा. हाँ क्यों नहीं होता, नहीं तो ये अंग और बाकी अवयव कहाँ टिके हुए हैं? बच्चा बुद्धिमान था. ठीक है तो अब सुनो. पिता ने कहना शुरू किया. तीन सूत्र हैं जिन पर विचार की आवश्यकता है. प्रथम ये कि यथा पिण्डं माने जैसा ये शरीर है, तथा ब्रम्हांडम वैसा ही ये जगत है. दूसरा ये कि मन चन्द्रमा का प्रतिनिधि है और तीसरा ये कि सूर्य आत्मा का बल है.  अब बैठो और अपना उत्तर स्वयं ढूंढो. बच्चे ने ध्यान लगा कर के चिंतन शुरू किया. बाल मन बहुत निर्मल होता है. इसीलिए वो जल्दी से कल्पनाएँ भी कर लेता है. उसे समाधान भी मिल जाते हैं. समझ में आने लगा सूर्य ग्रहण के समय शरीर में सूक्ष्म परिवर्तन होते हैं, और नहीं तो बायो क्लोक के चेंज होने का क्या मतलब है. अंतरिक्ष में परिवर्तन हो तो अंतरिक्ष विज्ञानी को सुविधा होती है, अंतरिक्ष के रहस्य समझने में. शरीर और मन में परिवर्तन होते हैं तो आत्म जिज्ञासु को सुविधा होती है, आन्तरिक रहस्यों को समझने में. उसने अपना रहस्य ढूढ़ लिया था. ये तो दर्पण में से पैदा हुए बिम्ब को निहारने से भी ज्यादा आनंददायक है. वो ख़ुशी से उछल पड़ा.
अन्वेषकों के लिए सूर्य ग्रहण एवं चन्द्र ग्रहण हमेशा से ही आकर्षित करने वाले विषय रहे हैं. यद्यपि विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में मिलने वाले डरावने उल्लेखों की वजह से लोग ग्रहण के समय बाहर निकलना उचित नहीं समझते, परन्तु फिर भी जिज्ञासू को कहाँ किसी का डर होता है. वह तो लगा रहता है अभी साधना में.
ग्रहण के समय घर के बड़े बुजुर्ग हमेशा कहा करते थे. बाहर मत निकलो, ग्रहण के समय कुछ खाने को नहीं मिलेगा, जो खाना है वो भी पहले ही ख़तम कर लो. ग्रहण के समय वाला खाना फेक देते हैं. बगैरह बगैरह. ऊपर लिखी कहानी में अतिरंजना हो सकती है पर यह एक ऐसी स्थिति का स्मरण है जो केवल ऐसे मन को प्राप्त है जो बच्चा है. यह एक ऐसी घटना का स्मरण है जब मैंने पहली बार किसी ग्रहण को इतनी गंभीरता से लिया था.
मैंने भी बालसुलभ जिज्ञासा से वे सरल उपकरण बनाये थे और अपने तमाम साथियों के साथ पूरे मनोयोग से उस महान खगोलीय घटना का अवलोकन किया था. बड़ा आनंद आया था, पर सोचिये कि अगर हमारे साथ के बड़े लोगों ने हमें निरुत्साहित किया होता तो क्या हमें ग्रहण के पीछे छिपे रहस्यों का पता चलपाता.
ऊपर लिखी कहानी में बच्चा जिज्ञासा का प्रतीक है और पिता धीर बुद्धि एवं ज्ञान का.आशा है सभी अपने अन्दर के इस बच्चे को हमेशा बच्चा ही रहने देंगे और पिता के ज्ञान की वृद्धि के लिए अधिकाधिक ग्रंथों का अध्ययन करेंगे